युद्ध के खिलाफ नागरिक

युद्ध के खिलाफ एकजुट हम

हम 26 फरवरी 2019 के शुरुआती घंटों में पाकिस्तान पर भारत की वायु सेना द्वारा एकतरफा हवाई हमलों और अगले दिन पाकिस्तान की वायु सेना द्वारा जवाबी हमलों के विरोध में एक साथ हैं। इससे दोनों देशों के बीच युद्ध जैसी स्थिति बन गई है।

हवाई हमलों के स्पष्टीकरण में भारत सरकार ने 14 फरवरी 2019 को पुलवामा में CRPF के काफिले पर हुआ आतंकी हमला बताया, जिसमें 40 से ज्यादा अर्द्धसैनिक मारे गए। इसके या किसी भी अन्य आतंकी हमले की निंदा के लिए कोई भी शब्द पर्याप्त नहीं है। हालाँकि, एक आतंकी हमला किसी भी हालात में भारत द्वारा अंतर्राष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों का उल्लंघन करने वाली कार्रवाइयों को उचित नहीं ठहरा सकता है ना ही इसका अधिकार देती है। समान रूप से, हम आतंक को बढ़ावा देने वाले या उसमें संलिप्त लोगों को पनाह देने के लिए पाकिस्तान की सरकार और सेना की निंदा करते हैं।

हम मानते हैं कि आतंक तब पनपता है और समाज में अपनी जड़े मजबूत करता है जब सरकारों द्वारा लोकतंत्र को कम करके आंका जाता है और लोगों को उनके राजनीतिक अधिकारों से वंचित करने के लिए राज्य बलों को लगाती है। जम्मू और कश्मीर के लोगों की यही हताशा है जो भारत की आजादी के बाद सात दशकों तक अपनी राजनीतिक आकांक्षाओं को उठाने के लिए लोकतांत्रिक माध्यमों से वंचित रहे हैं। पिछले साढ़े चार वर्षों में केंद्र की भाजपा की नेतृत्व वाली भारत सरकार ने राज्य की पुलिस, अर्धसैनिक बल और सेना का अभूतपूर्व पैमाने पर इस्तेमाल लोगों की आवाज़ दबाने के लिए किया है। लोगों का हाशिए और निराशा से भरा अनुभव इससे अधिक कभी नहीं रहा है।

भाजपा के नेतृत्व वाली वर्तमान सरकार, जिसने आरएसएस के साथ मिलकर, कश्मीर विवाद को पूरी तरह से पाकिस्तान द्वारा, आतंक और घुसपैठ की गतिविधियों को बढ़ावा देने के कारण, बताने में लगी हुई है। बीजेपी के लिए, कश्मीरियों और पाकिस्तानियों को निशाना बनाना बीजेपी द्वारा इस्लाम को बदनाम करते हुए आरएसएस के हिंदुत्व की विचारधारा और छद्म राष्ट्रवाद के एजेंडे को प्रशस्त करने की तरफ है। पुलवामा की घटना के बाद के दिनों में, कश्मीरी छात्रों, मज़दूरों, प्रवासी मज़दूरों और अन्य लोगों के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मौन रहते हुए भाजपाआरएसएस के लोगों की अगुवाई में शारीरिक हमलों को अंजाम दिया गया है। अब युद्ध राष्ट्रवाद की भाषा में कट्टरता को आगे बढ़ाने का हथियार बन गया है और इसपर समाज का ध्रुवीकरण और लोगों को विभाजित कर रहा है। अफसोस की बात है कि मीडिया, विशेष रूप से टेलीविजन मीडिया चैनलों ने इस निर्मित राष्ट्रवाद को बढ़ाया है और अपने स्टूडियो को सत्ता ताकतों की सेवा में “युद्ध के मैदान” में बदल दिया है। जल्दबाजी भरी और नाटकीय उग्रता कुछ भी नहीं बल्कि फिर से निर्वाचन सुनिश्चित करने के लिए मोदी सरकार की एक जघन्य रणनीति है।

हम कश्मीर विवाद के इतिहास, भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध और संघर्ष के इतिहास, और दुनिया भर में समय के साथ हुए युद्ध के इतिहास से सीखते और समझते हैं कि युद्ध से किसी का भी भला नहीं हुआ है। युद्ध संघर्ष और मतभेदों को बढ़ने का अवसर देता है। युद्ध अमीरों के लिए नहीं बल्कि मेहनतकशों, गरीबों, हाशिए के लोगों के लिए आर्थिक तंगी लाती है। दोनों पक्षों की सेना इन वंचित तबकों में से आते हैं और अपना जीवन खोते हैं। युद्ध इससे ज्यादा विनाश लाता है। इसकी आर्थिक लागत है जिसे भरपाई में दशकों लग जाते हैं। यह जीवन और आजीविका को नष्ट कर देता है। यह समाज और लोगों को विभाजित करता है।

भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष से आगे बढ़ने का एकमात्र तरीका कश्मीर विवाद का शांतिपूर्ण समाधान खोजना है।

हम इसके समर्थन में जिम्मेदार नागरिकों, जो जन संगठनों, सामाजिक आंदोलनों, ट्रेड यूनियनों और प्रगतिशील नागरिक समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, के रूप में एक साथ खड़े हैं:

हम भारत और पाकिस्तान की सरकारों से बातचीत के माध्यम से कश्मीर विवाद को हल करने का आह्वान करते हैं।

हम संयम और शांति का आह्वान करते हैं।

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