खून में सना है भारत का इस्पात

भारतीय इस्पात निगम लिमिटेड के भिलाई संयंत्र में 9 अक्टूबर 2018 को हुई आगज़नी जिसमें 11 श्रमिकों की जान चली गयी और 14 मजदूर गंभीर रूप से घायल हुए उस पर न्यू ट्रेड यूनियन इनिशिएटिव गहरा शोक व्यक्त करता है और इस मुश्किल घड़ी में उनके परिवारों के साथ है। हादसा कोक ओवन बैटरी काम्प्लेक्स नं 11 की उच्च चाप वाली गैस पाइपलाइन में लगभग 10 बजे प्रातः हुआ जिस वक़्त तकरीबन 24 मजदूर कार्यस्थल पर मौजूद थे और नियमित रखरखाव का काम चल रहा था। घायल मजदूरों का इलाज भिलाई इस्पात अस्पताल में चल रहा है।

भिलाई इस्पात संयंत्र की स्थापना 1955 में हुई थी और यह भारत का पहला और एकमात्र इस्पात की रेल बना सकने वाला संयंत्र था। आज भी भिलाई संयंत्र सेल की सर्वाधिक मुनाफा कमाने और उत्पादन करने वाली इकाई है।

सेल और भारत सरकार की कान पर जूं नहीं रेंगती

वर्ष 2015 में तत्कालीन उद्योग और वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमण के दिशा निर्देशों का पालन करते हुए छत्तीसगढ़ सरकार ने फैक्टरियों में होने वाले आकस्मिक और अनिवार्य जांच को निरस्त कर दिया था। तब से भिलाई संयंत्र में 31 मौतें हो चुकी हैं, जिसमें 09 अक्टूबर को हुई मौतें शामिल नहीं हैं।

औद्योगिक स्वास्थ्य और सुरक्षा निरीक्षक की प्राथमिक जांच रिपोर्ट में सामने आया है कि गैस पाइपलाइन की मरम्मत के वक़्त मानक संचालन प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और जल्दबाज़ी में काम ख़त्म करने मे हुइ लापरवाही के कारण हादसा हुआ। निरीक्षक ने यह भी पाया कि मरम्मत के वक़्त पाइपलाइन इस्तेमाल में थी जो कि संयंत्र की मूलभूत प्रक्रिया को प्राप्त आई.इस.9001:2000 प्रमाणिकता के विरुद्ध है, साथ ही जलवायु उत्तरदायित्व आचरण संहिता की इस.8000 प्रमाणिकता और कार्यस्थल सुरक्षा संहिता ओ.एच.सैस 18001 की भी अवमानना है।

सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में वर्ष 2017 से होने वाला यह चौथा मामला है और भिलाई संयंत्र में होने वाला दूसरा मामला है जब मरम्मत के नियमित काम के वक़्त हादसों में लोगों की जान चली गयी हो। इससे पहले 12 जून 2014 को भिलाई में कार्बन मोनोऑक्साइड गैस का रिसाव होने के कारण 6 मजदूरों की दम घुटने से मौत हो गयी थी और 50 अन्य मजदूरों की स्थिति गंभीर हो गयी थी।

जब से भाजपा सरकार ने ‘न्यूनतम हस्तक्षेप, अधिकाधिक प्रबंधन’ की नीति अपनायी है, जिसके तहत श्रम निरीक्षकों के अधिकार और संयंत्र परिक्षण के प्रावधान निरस्त कर दिए गए हैं तब से सार्वजिनक उपक्रमों में हो रही गैर इरादतन हत्या की कड़ी में जुड़ने वाला सेल नया नाम है। भारत सरकार की यह नीति संयुक्त राष्ट्र के कन्वेंशन 81 की भी अवमानना है जिसकी सम्पुष्टि भारत ने की है। साफ़ है कि स्वप्रमाणन, स्वनियमन और बहिरपक्षीय प्रमाणन की नीति के कारण बढ़ते कार्यस्थल हादसों से सेल और भारत सरकार ने कोई सीख नहीं ली है न ही भेल में लगी आग या कोच्ची पोत एवं एन.टी.पी.सी में व्यर्थ ही गई जानों से प्रबंधन के कानों पर कोई जूं रेंगी है।

कार्यस्थल बनी मौत की घाटी

वर्ष 2017 में भारत ने इज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस (व्यापार कर सकने की सुगमता) में 30 पायदानों की छलांग लगाई और प्रथम श्रेणी के 100 देशों की गिनती में पहुँच गया, वहीं बाकि सभी मानव विकास सूचियों में गिरावट आयी। फिर यह कोई अचरज की बात नहीं है की वर्ष 2017में भारत ने अपनी फैक्टरियों में कार्यस्थल पर 695 मौतें दर्ज कीं। सरकार श्रम कानूनों में संशोधन कर और 90 नयी नीतियों को लागू कर प्रथम 50 देशों की श्रेणी में आना चाहती है। फैक्टरियों में होने वाले मूल काम को ठेके पर दे कर या ठेका मजदूरों द्वारा करवा कर कम्पनियाँ अपनी जवाबदेही से बचने की कोशिश में हैं। आननफानन में वरिष्ठ अधिकारीयों को निलंबित कर भारत इस्पात निगम सारा दोष कुछ व्यक्तियों पर डाल देना चाहती है और उन नीतियों से पल्ला झाड़ लेना चाहती है जिनकी वजह से कार्यस्थल पर दुर्घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है।

न्यू ट्रेड यूनियन इनिशिएटिव भारत सरकार से मांग करती है कि वह:

  1. सुनिश्चित करे की मृतकों के परिवारों को मुआवज़े में वो रकम मिले जो श्रमिक अपनी कार्यावधि में कमा सकते थे। यह मुआवज़ा श्रेष्ठता की तर्ज़ पर तय न हो और समान काम के लिए समान वेतन को ध्यान में रखते हुए तय किया जाये
  2. चोटिल हुए स्थायी एवं अस्थायी दोनों ही मजदूरों को वैयक्तिक क्षति अधिनियम के अनुकूल समान मुआवज़ा मिले
  3. सेल प्रबंधन और सभी बहिरपक्षी ठेकेदार जो गैस पाइपलाइन के स्थापन, रखरखाव और नियमित मरम्मत के जिम्मेदार हैं उन पर गैर इरादतन हत्या के अभियोग चलाये जाएं न की सिर्फ श्रमिक उपलब्ध कराने वाले ठेकेदार पर
  4. कार्यस्थल सुरक्षा की जांच हेतु एक राष्ट्रीय समिति का गठन किया जाये
  5. समिति का गठन होने तक लंबित अवधि में 2014 से लागू किये गए सभी दिशानिर्देश व संशोधन वापिस लिए जाएं जिनके तहत मालिकों को स्वप्रमाणन के अधिकार मिले हैं और श्रम नियंत्रकों द्वारा प्रमाणन की प्रक्रिया शुरू की जाये

गौतम मोदी

महासचिव